धार में धाय धँसी निरधार ह्वै, जाय फँसी उकसी न अँधेरी। री अँगराय गिरी गहिरी, गहि फेरे फिरी न थिरी नहिं धेरी। 'देव' कछू अपनों बसु ना, रस लालच लाल चितै भई चेरी। बेगहीं बूड़ि गई पँखियाँ, अँखियाँ मधु की मखियाँ भई मेरी।।
हिंदी समय में देव की रचनाएँ